
शिविर के माध्यम से समाज के बच्चे सीख रहे हैं धर्म की शिक्षा एवं देव दर्शन अभिषेक की क्रियाएं।

भ्रम से उत्पन्न होने वाला दुख भ्रम के दूर होने पर ही नष्ट हो सकता है।
निज आत्मा के श्रद्धान से ही सच्चा सुख उत्पन्न हो सकता है,, डॉ. विवेक जैन
खंडवा। अहिंसा के माध्यम से ही संसार में शांति व्यवस्था बनी रह सकती है, किसी भी प्रकार की लड़ाई युद्ध से काफी नुकसान होता है। अहिंसा और क्षमा धर्म के पालन से ही विश्व में शांति हो सकती है। सभी सुखी रह सकते हैं, समाज के सचिव सुनील जैन ने बताया कि जैन धर्म के 24 तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी ने जियो और जीने दो के साथ अहिंसा का जो संदेश दिया उसका पालन कई देशों में किया जा रहा हें शांति का प्रतीक है अहिंसा, मुमुक्ष मंडल एवं समाज के तत्वावधान में प्रतिवर्ष अनुसार इस वर्ष भी जैनत्व बाल संस्कार शिक्षण शिविर एवं विश्व शांति की कामना को लेकर मंडल विधान की पूजा प्रतिदिन सराफा स्थित जैन धर्मशाला में विद्वान पंडितों के माध्यम से हो रही है। शिविर के तीसरे दिन प्रातः 6:45 प्रभात फेरी उसके पश्चात 7:15 से श्री जी का अभिषेक बच्चों द्वारा अभिषेक शांति धारा के तत्पश्चात देव शास्त्र एवं नित्य नियम पूजन बच्चों द्वारा किया गया 9:00 बजे से छिंदवाड़ा से पधारे डॉ विवेक जी जैन द्वारा प्रवचन किया गया दो दोपहर 2:00 बजे से 4:00 बजे तक संगीत मय मंडल विधान की पूजा की गई एवं शाम को बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए, सुनील जैन, प्रेमांशु जैन ने बताया कि शनिवार को श्री बृहदृ – द्रव्य संग्रह मण्डल विधान पर मुख्य कलश विराजमान करने का सौभाग्य नितीन कमलचंद जैन (अत्तर )परिवार को मिला विधान की संगीतमय पुजा पण्डित अपूर्व जैन (खानियांधाना) द्वारा कराई जा रही है।
इस अवसर पर डाँ विवेक जैन, छिंदवाड़ा ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि प्रत्येक जीव का आत्मा आनंद ज्ञान स्वरूपी है अतः निजानंद की प्राप्ति अत्यंत सरल कार्य है। आचार्य अमृतचन्द्र स्वामी कहते है कि आत्मानुभूति सहज साध्य है यत्न साध्य नहीं। जिस प्रकार गर्म जल को ठंडा करने के लिये कुछ करना नहीं मात्र उसे रखें रहने दें। उसी प्रकार सुख आनंद आत्मा का गुण है उसे प्राप्त करने लिये सिर्फ ज्ञान से आत्मा को देखकर ज्ञान आनंद स्वरूप स्वीकार मात्र करना है। परन्तु अज्ञानी जीव सच्चे सुख के स्वरूप से अनजान होकर भ्रम से इन्द्रिय विषयों में बाहर सुख की तलाश में लगा है अतः भ्रम से उत्पन्न होने वाला दुख भ्रम के दूर होने पर ही नष्ट हो सकता है एवं निज आत्मा के श्रद्धान से ही सच्चा सुख उत्पन्न हो सकता है।











